हमारे नजरिए और दूसरों के नजरिए

बहुत दिन हुए जब इन्टरनेट पर एक हिंदी सुविचार पढ़ा था “अगर आपको लगता है कि मैं ही सही हूँ और बाकि सभी गलत; तब निश्चित ही आप पर कोई बड़ी मुसीबत आने वाली है.”ये हिंदी वाक्य कई अर्थों में बहुत ही महत्वपूर्ण लगता है. अपनी गलती और दोष किसी को नहीं दिखते और अगर दिखाई भी देते हैं तो बहुत ही कम लोगों को. कई बार हम खुद के बारे में और अपनी विचारधारा के बारे  में अपनी एक ‘विचारधारा’ बना लेते हैं जो हमें सही लगती है और कई बार हम सही भी होते हैं, परन्तु समय के साथ साथ हमरी परिस्थितियों में और दूसरे लोगों में ब
दलाव होता जाता है, परन्तु विचारधारा एक जैसी होने के कारण हम उस पर ही अटल रहते हैं और यहीं से फिर गड़बड़ियाँ होना शुरू हो जाती हैं.


एक बार श्री दिनेश कुमार जैन जी से इस बारे में लम्बी बात हुई थी और उन्होंने सिर्फ एक बात कही थी कि ऐसे में हमें अपने आप के बारे में और अपनी सोच के बारे में शांतिपूर्वक विचार करना चाहिए कि कहीं हम किसी गलत तथ्य या गलत विचारधारा को ही तो सही मान कर तो नहीं बैठे?

हमारे नजरिये

कई बार हम दूसरे व्यक्ति की सोच और नजरिए को बदलने की कोशिश भी करने लगते है. कई बार हमारी हठधर्मिता भी सामने दिखने लगती है. ये सब इसलिए होता है क्योंकि हम अपने नजरिये पर अडिग रहते हैं. कई बार इसके अच्छे परिणाम आते हैं तो कई बार इसके side effect या दुष्परिणाम आने की सम्भावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता.

अगर ये बात है तब तो परेशानियाँ होना स्वाभाविक हैं. हमारी सोच हमारे व्यक्तित्व, आदर्श, जीवन मूल्यों और अनुभवों से बहुत अधिक प्रभावित होती है. इसीलिए कई बार हम देखते हैं कि अधिक परिपक्व लोगों की विचारधाराओं में अधिक उदारता और गहराई होती है. यही कारण है कि अलग-अलग व्यक्तियों की विचारधाराओं में बहुत अधिक अंतर होता है. हो सकता है कि आपकी विचारधारा आपके जीवनमूल्यों से जुडी है जबकि आपके दोस्त के जीवनमूल्य अलग हैं.

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अपने-अपने जीवन मूल्य

आप के मूल्य अपनी जगह सही हो सकते हैं और आपके दोस्त के मूल्य अपनी जगह सही. दोस्तों हो सकता है कि कई बार आपको लगता हो कि आप ही सही हैं लेकिन हो सकता है कि आप के सामने वाला भी सही हो.

कई बार चीजों को अलग अलग नजरिये से देखने से भी फ़ायदा होता है. किसी और के नजरिए से देखने से हो सकता है हमें वो चीज कुछ अलग दिखाई दे.

कोई हमें गलत कह दे ये सुनना बहुत पीड़ादायक होता है, कभी हम खुद को इस नजरिये से देखें कि कहीं हम ही तो गलत नहीं हैं तो शायद हम कुछ अलग चीज पायें.

कई बार हम खुद का मूल्यांकन भी सही तरीके से नहीं कर पाते तो फिर दूसरों के मूल्यांकन करने में गलतियाँ होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.

ये हिंदी वाकय निःसंदेह बहुत ही अर्थपूर्ण और उपयोगी है. आप के इस बारे में क्या विचार हैं?
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Anil Sahu
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4 thoughts on “हमारे नजरिए और दूसरों के नजरिए”

  1. अनिल जी,
    आपने बहुत ही अच्छी बात पर प्रकाश डाला है , अपनी सोच को अच्छा मानना सही है लेकिन अगर पता चले के आपकी कोई सोच कहीं पर गलत है तो उसे बदल लेना उचित होता है , उस टाइम अपना हठ अच्छा नहीं होता /
    आपका-
    amulsharma

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