सुखदेव के बचपन की कहानियां

सुखदेव के bachpan ki kahaniyan. Bhagat singh, Rajguru Sukhdev को कौन नहीं जानता? आज हम आजादी के यशस्वी महानायक सुखदेव थापर के बचपन की कुछ प्रेरणादायक कहानियां बताने जा रहे हैं। आशा करते हैं कि आप इन कहानियों को पढ़कर अच्छा महसूस करेंगे।

सुखदेव के साहस की कहानी

सुखदेव बचपन से ही साहसी थे। यह कहानी सन 1917 की है जब सुखदेव की उम्र 10 साल की थी। 1 दिन सुखदेव स्कूल के मैदान में थे। वहां मैदान में कुछ बच्चे खेल रहे थे। उस मैदान के पास एक कुंआ था। एक छोटा सा बालक दौड़ते हुए उस कुएं में गलती से गिर गया। नन्हे सुखदेव यह सब देख रहे थे वे तुरंत घर गए और बिजली की गति से एक रास्ता लाकर उसे कुएं में लटकाया। और दूसरे बच्चों के प्रयास से उन्होंने उस बच्चे को जीवित निकाल लिया। सुखदेव की माताजी ने बच्चे को छाती से लगा लिया और कहा शाबाश बेटा तुमने आज बड़ो जैसा काम किया है भगवान तुझे बहुत बड़ा आदमी बनाएगा। और सच में ही उस बच्चे ने 1 दिन बड़ो जैसा काम कर दिया और आजादी की लड़ाई में अपना नाम अमर कर लिया।

जब सुखदेव ने अंग्रेजों को चुनौती दी

जब सुखदेव लायलपुर के सनातन धर्म स्कूल में पढ़ते थे। उसी दौरान जनरल डायर ने जलियांवाला बाग में 20000 निहत्थे लोगों पर अंधाधुंध गोलियां चलवाई थी। इस घटना का 13 साल के सुखदेव पर बहुत प्रभाव पड़ा। और उसी समय सुखदेव के मन में यह भावना जागृत हो गई कि मैं इन दरिंदे अंग्रेजों को देश से खदेड़ दूंगा।

जब सुखदेव ने अंग्रेजों को सबक सिखाया

सुखदेव को जल्दी ही अपनी गुस्सा निकालने का मौका भी मिल गया। उनके स्कूल में अंग्रेज अफसर के आदेश से परेड में अंग्रेज अफसरों को सलामी देनी थी। सुखदेव बहुत ही ज्यादा गुस्से में थे उन्होंने अंग्रेज अफसर को सलामी नहीं दी। उनके इस व्यवहार के कारण उन पर खूब डंडे बरसाए। लेकिन सुखदेव बिना किसी पीड़ा के यह दर्द सहन कर गए और उन्होंने अंग्रेज अफसर को चुनौती दी कि वह इनके 11 डंडे का बदला गिन गिन कर लेंगे। नन्हे सुखदेव नहीं मन में भीष्म प्रतिज्ञा कर ली चाहे कुछ भी हो मेरे जीवन का उद्देश्य है अंग्रेजों को मेरे देश से भगाना। अगले दिन सुखदेव को सलामी नहीं देने और चुनौती देने के कारण सनातम स्कूल से निकाल दिया गया।

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सुखदेव ने शरारत को हमेशा के लिए अलविदा कर दिया

सुखदेव के बचपन की एक और कहानी बहुत ही अच्छी है। 1 दिन सुख सुखदेव अपने चचेरे भाई के साथ जा रहे थे। रास्ते में एक घोड़ा बैठा मिला। नन्हे सुखदेव ने अपने एक भाई जयदेव को घोड़े पर धकेल दिया। इस घटना से घोड़ हड़बड़ा कर उठा और उसका पैर जयदेव की अंगुली पर पड़ गया और जयदेव की उंगली कट गई। ऐसा होते ही डर के मारे सुखदेव पास के बगीचे में जाकर एक पेड़ पर छुप गए। रात होने पर भी सुखदेव घर नहीं लौटे तो लाला अंचित राम उनको ढूंढते ढूंढते उस पेड़ के पास पहुंचे। लाला चितराम को देखकर सुखदेव ने अपने को कड़ा दंड देने की अपील की। सुखदेव लाला अंचितराम को देखकर अपनी गलती का एहसास करते हुए फूट-फूटकर रो पड़े। और उन्होंने शपथ खाई कि आज के बाद भी जिंदगी में कभी भी शरारत नहीं करेंगे।

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सुखदेव का जन्म और बचपन

सुखदेव लाला रामलाल थापर और श्रीमती हला देवी की संतान थे। इनका जन्म लुधियाना जिले के नौधरा गांव में 15 मई सन 1907 में हुआ था। इनकी माताजी एक धार्मिक गृहणी थीं और bachpan se hi Sukhdev को देशभक्ति की कहानियां सुनाती थीं। इसका इनके व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव पड़ा। तीन साल की उम्र में ही सुखदेव के सिर से पिता का साया उठ गया था।

सुखदेव की मृत्यु

23 मार्च सन 1937 को भारत माता के महान सपूत सुखदेव को फांसी दी गई थी। 23 मार्च 1937 को 7 बजकर 33 मिनिट पर भारत माता के तीन सपूतों सुखदेब, राजगुरु और भगत सिंह को एक साथ फांसी पर चढ़ा दिया गया था।

दोस्तों इन महान क्रांतिकारियों को फांसी देने के बाद इनके शवों के साथ भी अंग्रेज अफसरों ने जो क्रूर व्यवहार किया उसे पढ़ कर आपकी आंखें नम हो जाएंगी।

सुखदेव की कहानी हर भारतवासी के लिए प्रेरणा देने वाली है। महान विभूति सुखदेव हमेशा याद रहेंगे। महान सुखदेव की निःस्वार्थ कुर्बानी की गाथाएं उन्हे तमाम क्रांतिकारियों में एक विशेष पहचान दिलाती हैं।

जय हिन्द जय भारत।

आशा है यह story about Sukhdev in Hindi आपको पसंद आई होगी।

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